सोमवार, 17 मई 2021

Vaidik Literature ( वैदिक साहित्य ) : यजुर्वेद

 नमस्कार दोस्तों ,

आज के लेख में हम वैदिक साहित्य के अंतर्गत दुसरे महत्वपूर्ण वेद यजुर्वेद के बारे में बात करेंगे . 

जैसा की आप जानते हैं वैदिक साहित्य में कुल चार वेद माने गये हैं :

1. ऋग्वेद 

2. यजुर्वेद 

3. सामवेद 

4. अथर्व वेद 

इससे पहले के लेख में हमने ऋग्वेद के बारे में चर्चा की थी . इसे आप हमारे ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं : https://devgandas.blogspot.com/2021/05/indianhistory-vaidik-literature.html

तो अब बात करते हैं यजुर्वेद के बारे में 




👉 यजुर्वेद :



  • दोस्तों यजुर्वेद में यज्ञीय कर्मकांडों का विवेचन किया गया है . 
  • यह वेद गध्य तथा पद्य दोनों में लिखित है. ( चम्पू शैली )
  • इस वेद को इसके पुरोहित अधर्व्यु के नाम पर अधर्व्युवेद के नाम से भी जाना जाता है.
  • पतंजली के महाभाष्य में इसकी 101 शाखाओं का उल्लेख किया गया है.
  • वर्तमान में यजुर्वेद की केवल 06 शाखाएं ही उपलब्ध हैं.

  • यजुर्वेद के 02 भाग प्राप्त होते हैं : 1. शुक्ल यजुर्वेद  2. कृष्ण यजुर्वेद 


👉 शुक्ल यजुर्वेद :

  • शुक्ल यजुर्वेद की 02 शाखाएं उपलब्ध होती है : (1) माध्यनन्दिन / वाजसनेय (2) कण्व 
  • शुक्ल यजुर्वेद को वाजसनेयी संहिता के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि सूर्य ने वाजी नामक घोड़े का रूप धारण कर याज्ञवल्क्य ऋषि को इसके मन्त्र प्रदान किये थे.
  • माध्यनन्दिन तथा कण्व शाखा में मन्त्रों की संख्या समान है . केवल कुछ यज्ञीय कर्मकांडों में अंतर मिलता है .
  • माध्यनन्दिन शाखा का प्रचार उत्तर भारत में तथा कण्व शाखा का प्रचार महाराष्ट्र में मिलता है .
  • वाजसनेयी संहिता में अम्बिका का उल्लेख रूद्र की पत्नी के रूप में मिलता है. इसी में प्रथम बार देश एवं वाणिज्य शब्द का उल्लेख मिलता है.
  • शुक्ल यजुर्वेद आदित्य संप्रदाय से सम्बंधित है तथा इसमें केवल यज्ञीय कर्मकांडों के दौरान उच्चारित किये जाने वाले मन्त्रों का उल्लेख मिलता है.
  • इसके मन्त्रों को सूर्य के द्वारा दिन के प्रकाश में दिया गया. इस कारण इसे शुक्ल यजुर्वेद कहा जाता है.
  • शुक्ल यजुर्वेद के अधिकांश मन्त्रों को कृष्ण यजुर्वेद से लेकर बाद में संकलित किया गया , इस कारण यह कृष्ण यजुर्वेद से बाद का है और स्पष्ट व सुव्यवस्थित है.

👉 कृष्ण यजुर्वेद :

  •  कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाओं का उल्लेख मिलता है : (1) कठ (2) कपिष्ठल (3) तैतरीय (4) मैत्रायणी 
  • कृष्ण यजुर्वेद का सम्बन्ध ब्रह्म संप्रदाय से स्थापित किया जाता है तथा यह यजुर्वेद का सबसे प्राचीनतम भाग है.
  • इसके मन्त्र दिन के प्रकाश में न दिए जाने के कारण यह कृष्ण कहलाता है.
  • यह अव्यवस्थित स्वरुप में प्राप्त होता है तथा इसमें मन्त्र एवं ब्राह्मण का मिश्रण मिलता है .

यजुर्वेद के ब्राह्मण ग्रन्थ :

1. शुक्ल यजुर्वेद : शतपथ ब्राह्मण 
2. कृष्ण यजुर्वेद : तैतरीय ब्राह्मण 

यजुर्वेद के आरण्यक ग्रन्थ :

1. शुक्ल यजुर्वेद : वृह्दारण्यक  
2. कृष्ण यजुर्वेद : तैतरीय एवं मैत्रायणी आरण्यक 

यजुर्वेद के उपनिषद ग्रन्थ :

1. शुक्ल यजुर्वेद : वृह्दारण्यक उपनिषद , ईश उपनिषद् 
2. कृष्ण यजुर्वेद : कठोपनिषद , मैत्रायणी उपनिषद् , तैतरीय उपनिषद , श्वेताश्वर उपनिषद् 

👉 यजुर्वेद का पुरोहित : अधर्व्यु 

👉 यजुर्वेद का उपवेद : धनुर्वेद 

👉 यजुर्वेद का अंतिम भाग ईशोपनिषद के नाम से जाना जाता है तथा यह सबसे प्रमाणिक माना जाता है .

👉 शुक्ल यजुर्वेद में 40 अध्याय तथा 1975 मन्त्र हैं.

👉 यजुर्वेद में शून्य का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है.

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तो दोस्तों कैसा लगा आपको हमारा आज का लेख . आप अपने कमेंट के द्वारा हमें जरुर सूचित करें 
धन्यवाद 
आपका अपना 
देवकरण गंडास 
व्याख्याता इतिहास 

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