बुधवार, 19 मई 2021

World Happiness Report 2021

 World Happiness Report 2021:



संयुक्त राष्ट्र सतत विकास समाधान नेटवर्क (UN Sustainable Development Solutions Network) द्वारा World Happiness Report 2021 जारी की गई है.  

👉 इस लेख के माध्यम से हम यह जानेंगे कि इसमें भारत की रैंक क्या है और हैप्पीनेस को किस प्रकार मापा जाता है।

World Happiness Report :-


  • संयुक्त राष्ट्र सतत विकास समाधान नेटवर्क (UN Sustainable Development Solutions Network) द्वारा World Happiness Report 2021, 19 मार्च को जारी की गई है 
  • फिनलैंड एक बार फिर दुनिया के सबसे खुशहाल देश के रूप में पहली रैंक पर है. 
  • इस रिपोर्ट के अनुसार फिनलैंड को लगातार चौथे साल दुनिया का सबसे खुशहाल देश पाया गया है. 
  • इस साल यह रिपोर्ट COVID-19 के प्रभावों और दुनिया भर के लोगों पर किस प्रकार से प्रभाव पड़ा है पर केंद्रित है.
  • यह रिपोर्ट 149 देशों के बारे में जारी की गई है और यह बताती है कि उनके नागरिक खुद को कितना खुश मानते हैं.
  • संयुक्त राष्ट्र सतत विकास समाधान नेटवर्क (UN Sustainable Development Solutions Network) द्वारा प्रायोजित 149 देशों की ये वार्षिक रिपोर्ट प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद, हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी और नागरिकों की राय पर आधारित है.
  • रिपोर्ट ने जीडीपी, सामाजिक समर्थन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और प्रत्येक राष्ट्र में भ्रष्टाचार के स्तर जैसे कारकों को ध्यान में रखते हुए खुशी के स्तरों का मूल्यांकन किया.
  • इस साल, लेखकों को रिपोर्ट में संबोधित करने के लिए एक अनूठी नई चुनौती थी और वह ये कि दुनिया भर के राष्ट्रों में हो रही COVID-19 महामारी और इसके विनाशकारी प्रभाव.
  • 1-10 के स्केल पर इस सर्वे के दौरान लोगों से कुछ सवाल पूछे गए थे. मुख्य रूप से जीवन की गुणवत्ता, सकारात्मक और नकारात्मक भावों के आधार पर इस रिपोर्ट को तैयार किया गया है.


World Happiness Report 2021 यह याद दिलाती है कि हमें केवल धन के बजाय भलाई के लिए लक्ष्य रखना चाहिए, जो वास्तव में क्षणभंगुर होगा यदि हम सतत विकास की चुनौतियों का सामना करने के लिए बेहतर काम नहीं करते हैं.


दुनिया भर में महामारी के कहर के साथ, इस वर्ष की रिपोर्ट ने रैंकिंग के दो अलग-अलग सेट प्रदान किए - गैलप (Gallup) द्वारा 2018-2020 में किए गए सर्वेक्षणों के तीन वर्षों के औसत के आधार पर एक सामान्य सूची, और दूसरी और 2020 में COVID-19 ने व्यक्तिपरक को कैसे प्रभावित किया.


World Happiness Report 2021 में भारत का स्थान :


इस सूची में 149 देशों में से भारत 139वें स्थान पर है. 


👉 World Happyness Report : Top 10 Countries

इस सूची में 10 शीर्ष देशों में से नौ यूरोप के हैं. 

  • 1st रैंक पर फिनलैंड
  • 2nd पर डेनमार्क, 
  • 3rd पर स्विट्जरैंड, 
  • 4th पर आइसलैंड, 
  • 5th पर नीदरलैंड, 
  • 6th पर नॉर्वे, 
  • 7th पर स्वीडन, 
  • 8th पर लग्जमबर्ग और 
  • 9th पर न्यूज़ीलैंड है.


👉 World Happyness Report : Last 05 Countries

  • अफगानिस्तान (149 रैंक) दुनिया का सबसे कम खुशहाल या अप्रसन्न देश है.
  • 148- ज़िम्बाबवे (Zimbabwe)
  • 147- रवांडा (Rwanda)
  • 146- बोत्स्वाना (Botswana)
  • 145- लेसोथो (Lesotho)


👉 कुछ महत्वपूर्ण देशों की रैंक इस प्रकार है :

  • 19 - अमेरिका (America)
  • 84- चीन (China)
  • 87 - नेपाल (Nepal)
  • 101 - बांग्लादेश (Bangladesh)
  • 105 - पाकिस्तान (Pakistan)
  • 126 - म्यांमार (Myanmar)
  • 129 - श्रीलंका (Srilanka)


👉 वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट सतत विकास समाधान नेटवर्क का एक प्रकाशन है, जो गैलप वर्ल्ड पोल (Gallup World Poll) और लॉयड्स रजिस्टर फाउंडेशन (Lloyd’s Register Foundation) के डेटा द्वारा संचालित है, जिन्होंने वर्ल्ड रिस्क पोल तक पहुंच प्रदान की.


👉 2021 की रिपोर्ट में COVID डेटा हब के हिस्से के रूप में ICL-YouGov Behaviour Tracker का डेटा शामिल है.


👉 अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस (International Happiness Day)

 हर साल 20 मार्च को मनाया जाता है ताकि लोगों के जीवन में खुशहाली बढ़े. संयुक्त राष्ट्र ने 2013 में अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस मनाने की शुरुआत की थी लेकिन जुलाई, 2012 में इसके लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया था. इस साल का थीम “Happiness For All, Forever” है.

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सोमवार, 17 मई 2021

Vaidik Literature ( वैदिक साहित्य ) : यजुर्वेद

 नमस्कार दोस्तों ,

आज के लेख में हम वैदिक साहित्य के अंतर्गत दुसरे महत्वपूर्ण वेद यजुर्वेद के बारे में बात करेंगे . 

जैसा की आप जानते हैं वैदिक साहित्य में कुल चार वेद माने गये हैं :

1. ऋग्वेद 

2. यजुर्वेद 

3. सामवेद 

4. अथर्व वेद 

इससे पहले के लेख में हमने ऋग्वेद के बारे में चर्चा की थी . इसे आप हमारे ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं : https://devgandas.blogspot.com/2021/05/indianhistory-vaidik-literature.html

तो अब बात करते हैं यजुर्वेद के बारे में 




👉 यजुर्वेद :



  • दोस्तों यजुर्वेद में यज्ञीय कर्मकांडों का विवेचन किया गया है . 
  • यह वेद गध्य तथा पद्य दोनों में लिखित है. ( चम्पू शैली )
  • इस वेद को इसके पुरोहित अधर्व्यु के नाम पर अधर्व्युवेद के नाम से भी जाना जाता है.
  • पतंजली के महाभाष्य में इसकी 101 शाखाओं का उल्लेख किया गया है.
  • वर्तमान में यजुर्वेद की केवल 06 शाखाएं ही उपलब्ध हैं.

  • यजुर्वेद के 02 भाग प्राप्त होते हैं : 1. शुक्ल यजुर्वेद  2. कृष्ण यजुर्वेद 

रविवार, 16 मई 2021

IndianHistory : Vaidik Literature ( वैदिक साहित्य ) : ऋग्वेद

 वैदिक साहित्य ( Vaidik Literature ) :

नमस्कार दोस्तों ,

आज के लेख में हम वैदिक साहित्य के बारे में चर्चा करेंगे . आज का यह लेख मुख्यतः ऋग्वेद पर केन्द्रित है. 

इस लेख में हम निम्न बिन्दुओं पर चर्चा करेंगे :

1. वेद क्या हैं ?
2. ऋग्वेद के संहिता, ब्राह्मन, आरण्यक और उपनिषद् ग्रन्थ 
3. ऋग्वेद के 10 मंडल और उनके संकलन कर्ता ऋषि 
4. अन्य महत्वपूर्ण तथ्य 

तो आइये इन पर विस्तार पूर्वक चर्चा करते हैं 




1. वेद ( Ved ):-

👉 वेद शब्द विद्  धातु से निर्मित है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है - जानना . 
अर्थात वे ग्रन्थ जो ज्ञान से परिपूर्ण हैं वो वेद कहलाये .
  • श्रुति  : वेदों को श्रुति भी कहा जाता है क्योंकि ये श्रवण परम्परा पर आधारित ग्रन्थ हैं.
  • अपौरुषेय : वेदों को मानवीय रचना न मानकर ईश्वरीय रचना के रूप में देखा जाता है , अतः इन्हें अपौरुषेय भी कहा जाता है . 
  • वेदत्रयी : वेदत्रयी में केवल तीन वेदों को सम्मिलित किया गया है : ऋग्वेद , सामवेद तथा यजुर्वेद .
  • अथर्ववेद को उस पर अवैदिक परंपरा के प्रभाव के कारण वेदत्रयी से बाहर रखा गया है.
👉 प्रत्येक वेद  चार भाग होते हैं : 
1.संहिता 
2. ब्राह्मण ग्रन्थ 
3. आरण्यक 
4. उपनिषद


[ जैन धर्म तथा महावीर स्वामी के लिए इस लिंक को खोलें : https://devgandas.blogspot.com/2021/05/indianhistory01.html  ]


2. ऋग्वेद ( Rigved ) :- 




जैसा कि हमने अभी चर्चा की , प्रत्येक वेद के चार भाग होते हैं . तो अब चर्चा करते हैं ऋग्वेद के इन चारों भों पर 
  1.  संहिता : ऋग्वेद की संहिता का नाम ऋक संहिता या ऋग्वैदिक संहिता है.
  2. ब्राहमण ग्रन्थ : ऋग्वेद के ब्राहमण ग्रन्थ ऐतरेय ब्राहमण तथा कौषुतिकी ब्राहमण है.
  3. आरण्यक : ऋग्वेद के आरण्यक ग्रन्थ ऐतरेय आरण्यक तथा कौषुतिकी आरण्यक है.
  4. उपनिषद : ऋग्वेद के उपनिषद ग्रन्थ ऐतरेय उपनिषद तथा कौषुतिकी उपनिषद है.

  • ऋग्वेद का उपवेद : आयुर्वेद है .
  • ऋग्वेद का पुरोहित : होता या होतृ कहलाता है , जो मंत्रवाचन करता है. 
  • महर्षि पतंजलि के अनुसार ऋग्वेद की 21 शाखाएं उपलब्ध थी .
  • चरण व्यूह के लेखक के अनुसार ऋग्वेद की पांच शाखाएं उपलब्ध हैं :
  1. शाकल 
  2. वाष्कल 
  3. शांखायन 
  4. माण्डुकायन 
  5. आश्वलायन 
  • वर्तमान में केवल शाकल शाखा ही उपलब्ध है और इसी का ऋग्वैदिक संहिता के रूप में अध्ययन किया जाता है .
  • शाकल शाखा में 10 मंडल विद्यमान हैं , इस कारण ऋग्वेद को दसतयी भी कहा जाता है .
  • ऋग्वेद में मंडलों को अनुवाकों में, अनुवाकों को सूक्तों में तथा सूक्तों को श्लोकों में विभाजित किया गया है .
  • इस प्रकार ऋग्वेद की शाकल शाखा में कुल - 10 मंडल , 85 अनुवाक , 1028 ( 1017 + 11 ) सूक्त तथा 10580 श्लोक हैं. 

[ जैन दर्शन के लिए यहाँ क्लिक करें : https://devgandas.blogspot.com/2021/05/indianhistory02.html  ]


3. ऋग्वेद के 10 मंडल और उनके संकलन कर्ता ऋषि :

मंडल                          सूक्त                     संकलन कर्ता ऋषि 
प्रथम                           191                       मधुछंदा तथा विश्वामित्र 
दूसरा                           43                        गृहत्समद 
तृतीय                          62                         विश्वामित्र 
चतुर्थ                          58                         वामदेव 
पंचम                          87                          अत्रि 
षष्ठम                         75                          भारद्वाज 
सप्तम                       104                         वशिष्ठ 
अष्टम                        92                          कण्व
नवम                           114                           पवमान 
दशम                           191                          विभिन्न ऋषि समूह 
  • ऋग्वेद में दुसरे से सातवाँ मंडल सबसे प्राचीन हैं. इसके बाद आठवां मंडल जोड़ा गया तथा पहला और दशम मंडल सबसे अंत में जोड़े गये हैं . 
  • दुसरे से सातवें मंडल को ऋषि मंडल / परिवार मंडल / गोत्र मंडल के नाम से भी जाना जाता है .
  • आठवें मंडल को प्रगठ मंडल के नाम से जाना जाता है क्योंकि इसमें मिश्रित छंदों का प्रयोग किया गया है .
  • दुसरे से सातवें मंडल का प्रारंभ अग्नि की स्तुति से होता है . इसमें दुसरे स्थान पर इंद्र को रखा गया है.
  • ऋग्वेद के तीसरे मंडल में गायत्री मन्त्र मिलता है.
  • ऋग्वेद के सातवें मंडल में दसराज्ञ युद्ध का विवरण मिलता है. इस मंडल का संकलन सरस्वती नदी के किनारे किया गया था.
  • ऋग्वेद का नवम मंडल कर्मकांडीय मंडल है . यह सोम देवता को समर्पित है.
  • ऋग्वेद के दशम मंडल में प्रसिद्द पुरुष सूक्त का उल्लेख मिलता है , जिसमें चारों वर्णों की उत्पति का दैवीय सिद्धांत मिलता है.


[ जैन तीर्थंकर तथा जैन संगीतियों के लिए यहाँ पर क्लिक करें : https://devgandas.blogspot.com/2021/05/indianhistory03.html  ]


अन्य महत्वपूर्ण तथ्य :

  • ऋग्वेद का सबसे प्राचीनतम सूक्त उषा सूक्त ( अरोरा सूक्त ) है तथा यह सबसे सुन्दरतम सूक्त माना जाता है .
  • ऋग्वेद के वार्ता सूक्त में उर्वशी तथा पुरुरवा के मध्य वार्ता का उल्लेख मिलता है .
  • ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल में हमें अजमीढ़ , पुरुमीढ़ तथा त्रास दस्यु नामक शासकों का उल्लेख मिलता है.

[ G7 समूह के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें : https://devgandas.blogspot.com/2021/05/g7.html  ]


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आपका अपना 
देवकरण गंडास 
व्याख्याता इतिहास 

शनिवार, 15 मई 2021

G7 समूह और भारत

 नमस्कार दोस्तों ,

आपने समाचार में सुना होगा कि 11 मई 2021 को विदेश मंत्रालय ने यह जानकारी दी कि  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 47वें G7 शिखर सम्मलेन की यात्रा को कोरोना के कारण रद्द कर दिया है. 

प्रधानमंत्री मोदी को G7 सम्मलेन में शामिल होने के लिए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जोनसन ने आमंत्रण भेजा था .

आज के लेख में हम जानेंगे कि यह G7 समूह क्या है ? इसके सदस्य राष्ट्र कौन कौन हैं ? और यह किस प्रकार काम करता है ?

तो प्रारंभ करते हैं आज का लेख ...



👉 G7 क्या है ? ( What is G7 )

  • यह एक अंतर-सरकारी संगठन है, जिसकी स्थापना वर्ष 1975 में की गई थी।
  • वैश्विक आर्थिक शासन, अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा नीति जैसे सामान्य हित के मुद्दों पर चर्चा करने के लिये वार्षिक तौर पर संगठन के सदस्य देशों की बैठक आयोजित की जाती है।
  • G-7 संगठन का कोई औपचारिक संविधान और स्थायी मुख्यालय नहीं है। वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान लिये गए निर्णय सदस्य देशों पर गैर-बाध्यकारी होते हैं।
  • G7 दुनिया की सात सबसे बड़ी कथित विकसित और उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों का समूह है, जिसमें कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमरीका शामिल हैं. इसे ग्रुप ऑफ़ सेवन भी कहते हैं.
  • यह समूह खुद को "कम्यूनिटी ऑफ़ वैल्यूज" यानी मूल्यों का आदर करने वाला समुदाय मानता है. स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की सुरक्षा, लोकतंत्र और क़ानून का शासन और समृद्धि और सतत विकास, इसके प्रमुख सिद्धांत हैं.
  • G7 की पहली बैठक साल 1975 में हुई थी. तब सिर्फ 6 देश इस ग्रुप में शामिल थे. फिर अगले साल कनाडा भी इस ग्रुप में शामिल हो गया. इस तरह ये G6 से बन गया G7. पहली बैठक में दुनियाभर में आर्थिक संकट के संभावित समाधानों पर चर्चा की गई थी.
  • वर्ष 1997 में रूस के इस समूह में शामिल होने के बाद कई वर्षों तक G-7 को 'G- 8' के रूप में जाना जाता रहा। 
  • हालाँकि रूस को वर्ष 2014 में क्रीमिया विवाद के बाद समूह से निष्कासित कर दिये जाने के पश्चात् समूह को एक बार पुनः G-7 कहा जाने लगा।
  • इसके शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के राष्ट्र प्रमुख, यूरोपीयन कमीशन और यूरोपीयन काउंसिल के अध्यक्ष शामिल होते हैं.

👉 किन मुद्दों पर होती है चर्चा ?

  • G7 शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के मंत्री और नौकरशाह आपसी हितों के मामलों पर बातचीत के लिए हर साल मिलते हैं. 
  • सदस्य देश उन मद्दों पर बातचीत करते हैं, जिनका वैश्विक महत्व होता है. 
  • इसमें आर्थिक, विदेश, सुरक्षा और विकास जैसे मुद्दे शामिल होते हैं. 
  • यहां उन मुद्दों पर भी बातचीत की जाती है, जिनपर राजनीतिक कार्रवाई की जरूरत होती है या आम लोगों से जुड़ा होता है.

👉 चीन इसका हिस्सा क्यों नहीं है ?

  • चीन दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवथा है, फिर भी वो इस समूह का हिस्सा नहीं है. इसकी वजह यह है कि यहां दुनिया की सबसे बड़ी आबादी रहती हैं और प्रति व्यक्ति आय संपत्ति जी-7 समूह देशों के मुक़ाबले बहुत कम है.
  • ऐसे में चीन को उन्नत या विकसित अर्थव्यवस्था नहीं माना जाता है, जिसकी वजह से यह समूह में शामिल नहीं है.
  •  हालांकि चीन जी-20 देशों के समूह का हिस्सा है, इस समूह में शामिल होकर वह अपने यहां शंघाई जैसे आधुनिकतम शहरों की संख्या बढ़ाने पर काम कर रहा है.

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शुक्रवार, 14 मई 2021

IndianHistory : जैन तीर्थंकर एवं जैन संगीतियाँ

नमस्कार दोस्तों ,

मैं देवकरण गंडास आप सभी का हार्दिक स्वागत करता हूँ इस ब्लॉग पर . दोस्तों आज की पोस्ट में हम जैन संप्रदाय के तीर्थंकरों एवं जैन धर्म की संगीतियों के बारे में बात करेंगे .





इससे पहले की पोस्ट में हमने जैन धर्म तथा जैन दर्शन पर व्यापक चर्चा की थी . इसके लिए आप निम्न लिंक पर जा सकते हैं 

जैन धर्म : https://devgandas.blogspot.com/2021/05/indianhistory01.html

जैन दर्शन : https://devgandas.blogspot.com/2021/05/indianhistory02.html 

तो इस पोस्ट में बात करते हैं जैन तीर्थंकर और जैन संगीतियों के बारे में 

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जैन तीर्थंकर : महत्वपूर्ण तथ्य 

जैन परंपरा के अनुसार जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं . हम परीक्षा की दृष्टी से उपयोगी कुछ महत्वपूर्ण तीर्थंकरों के बारे में यहाँ चर्चा करेंगे .

प्रथम तीर्थंकर : ऋषभ देव / आदिनाथ 

  • पिता : अयोध्या नरेश नाभि 
  • माता : मरू देवी 
  • पत्नी : सुनंदा 
  • ये अयोध्या के राजा थे 
  • इन्होंने कैलाश पर्वत पर निर्वाण प्राप्त किया था 
  • इनकी कुषाण कालीन मूर्तियाँ मथुरा से प्राप्त होती हैं 
  • इनका उल्लेख ऋग्वेद में शम्भू कश्यप के नाम से मिलता है 
  • इन्हें विष्णु पुराण तथा भागवत पुराण में विष्णु का अवतार माना गया है 
  • इनका शासन देवता चक्रेश्वरी को माना जाता है 
  • इनका प्रतीक चिन्ह वृषभ माना जाता है.

दुसरे तीर्थंकर : अजित नाथ 

  • पिता : जित शत्रु 
  • माता : विजया देवी 
  • 12 वर्ष की कठोर तपस्या के पश्चात अयोध्या में कैवल्य प्राप्त किया 
  • इनकी प्राचीनतम प्रतिमाएं वाराणसी से प्राप्त होती हैं .

तीसरे तीर्थंकर : संभव नाथ 

  • पिता : जितारी ( श्रावस्ती के राजा )
  • माता : सोना देवी 
  • इनको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति श्रावस्ती में हुई .

चौथे तीर्थंकर : अभिनन्दन 

  • पिता :संवर 
  • माता : सिद्धार्थी 
  • इनकी 10वीं सदी से पहले की कोई प्रतिमा विद्यमान नहीं है 
  • इनकी कुछ प्रतिमाएं खजुराहो से प्राप्त होती हैं .

पांचवें तीर्थंकर : सुमतिनाथ 

  • पिता : मेघ ( अयोध्या के राजा )
  • माता : मंगला 
  • इनको 20 वर्ष की कठोर तपश्चर्या के पश्चात कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई 
  • इनकी भी 10वीं सदी से पहले की कोई प्रतिमा विद्यमान नहीं है .

6. पदमप्रभ  
7. सुपार्श्व 
8.चन्द्र प्रभ 
9. पुष्पदन्त 
10. शीतल 
11. श्रेयांश 
12. वासु पूज्य 
13. विमल 
14. अनन्त 
15. धर्म 
16. शांति 
17. कुन्थु 
18.अरह 

19 वें तीर्थंकर : मल्ली नाथ 

  • पिता : कुम्भ ( मिथिला के शासक )
  • माता : प्रभावती 
  • श्वेताम्बर संप्रदाय के अनुयायी मल्ली को एक स्त्री तीर्थंकर मानते हैं 
  • दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी मल्लीनाथ को पुरुष तीर्थंकर मानते हैं .

20. मुनि सुब्रत 
21. नमि

22 वें तीर्थंकर : नेमिनाथ / अरिष्टनेमि 

  • इनका उल्लेख भी ऋग्वेद में मिलता है 
  • इनके शासन देवता के रूप में अम्बिका का नाम मिलता है 
  • इनका प्रतीक चिन्ह शंख है .

23 वें तीर्थंकर : पार्श्वनाथ

  • पिता : अश्वसेन ( काशी के राजा )
  • माता : वामा 
  • इनको ज्ञान की प्राप्ति धातकी वृक्ष के नीचे हुई 
  • इनको निर्वाण प्राप्ति पार्श्वनाथ पहाड़ी ( हजारीबाग , झारखण्ड ) में हुई 
  • ऐसा माना जाता है कि इनसे पहले के 19 तीर्थंकरों को भी निर्वाण प्राप्ति इसी पहाड़ी पर हुई थी 
  • इन्होंने महिलाओं को संघ में प्रवेश की अनुमती प्रदान की 
  • इनसे सम्बंधित यक्ष का नाम पद्मावती है 
  • इनका प्रतिक चिन्ह सांप माना जाता है .

24 वें तीर्थंकर : महावीर स्वामी 

  • पिता : सिद्धार्थ 
  • माता : त्रिशला 
  • पत्नी : यशोदा 
  • पुत्री : अणोज्जा / प्रियदर्शना 
  • दामाद : जामाली 
  • निर्वाण : पावापूरी 
  • इनकी शासन देवी सिद्धायिका मानी जाती है 
  • इनका प्रतीक चिन्ह सिंह है .

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जैन संगीतियाँ : महत्वपूर्ण तथ्य 


जैन धर्माचार्यों की कुल चार संगीतियाँ आयोजित की गई थी , जो इस प्रकार हैं 

प्रथम जैन संगीति :

  • आयोजन महावीर स्वामी की मृत्यु के २०० वर्ष पश्चात 
  • आयोजन स्थल : पाटलिपुत्र 
  • अध्यक्ष : स्थुलभद्र 
  • इस संगीति में जैन धर्म श्वेताम्बर तथा दिगंबर संप्रदाय में विभाजित हो गया था 
  • इसी समय जैन धर्म के 12 अंगों का भी संकलन किया गया था 
  • नोट :- इस समय मगध में 12 वर्षों का भयंकर अकाल पड़ा था . फलत: भद्रबाहु अपने शिष्यों के साथ कर्नाटक चले गये किन्तु कुछ अनुयायी स्थूलभद्र के साथ मगध में ही रुक गये . भद्रबाहु के वापिस लौटने पर मगध के साधुओं से उनका गहरा मतभेद हो गया तथा जैन धर्म दो भागों में बंट गया . स्थुलभद्र के अनुयायी श्वेताम्बर कहलाये तथा भद्रबाहु के दिगंबर 
  • प्रथम जैन संगीति में जो सिद्धांत निर्धारित किये गये थे , वे श्वेताम्बर संप्रदाय के मूल सिद्धांत बन गये .
  • दिगम्बरों ने प्रथम जैन संगीति में भाग नहीं लिया था 
  • नोट : छठी शताब्दी में श्वेताम्बरों में तेरापंथी तथा दिगम्बरों में समैया नामक उपसंप्रदाय का उदय हुआ .  समैया संप्रदाय वाले मूर्ति पूजा के स्थान पर पुस्तकों की पूजा पर बल देते हैं .

दूसरी जैन संगीति :

  • आयोजन : कलिंग नरेश खारवेल के शासन काल में 
  • सुपर्वत पर बनाये गये विजय चक्र नामक विशाल सभागार में 
  • इसमें 12 अंगों का पुन: संकलन किया गया 

तीसरी जैन संगीति : 

  • प्रथम सदी ईस्वी में 
  • आन्ध्र प्रदेश में वेणव नदी के किनारे 
  • अध्यक्ष : जैन आचार्य आर्हदली
  • इसमें 12 अंगों का विवेचन किया गया 

चतुर्थ जैन संगीति : 

  • 512 ईस्वी में 
  • गुजरात के वल्लभी में 
  • अध्यक्ष : देवर्धि क्षमाश्रमण 
  • इसमें जैन आगम साहित्य का संकलन किया गया 
  • इस सभा द्वारा निर्धारित किया गया जैन धर्म का स्वरुप आज तक विद्यमान है.

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जैन धर्म के संरक्षक शासक एवं राजवंश :

  1. मौर्य शासक चन्द्रगुप्त 
  2. मौर्य शासक सम्प्रति 
  3. कलिंग नरेश खारवेल 
  4. गंग वंश के शासक 
  5. कदम्ब वंश 
  6. गुजरात के चालुक्य 
  7. राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष 

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अन्य महत्वपूर्ण तथ्य :

  • लिच्छवी नरेश चेटक महावीर स्वामी का अनुयायी था . आवश्यक चूर्णी नामक ग्रन्थ से चेटक विषयक जानकारी मिलती है .
  • महावीर स्वामी के तप का वर्णन आचरांग सूत्र में मिलता है .
  • मक्खलीपुत्त गोशाल महावीर स्वामी का शिष्य नालंदा में बना था .
  • महावीर स्वामी की प्रथम भिक्षुणी तथा भिक्षुणी संघ की प्रथम अध्यक्ष चंपा की राजकुमारी चंदना थी , जो चंपा नरेश दधिवाहन की पुत्री थी. 
  • महावीर स्वामी के जीवन चरित्र का वर्णन भगवती सुत्त में मिलता है. 
  • महावीर स्वामी की शिक्षाओं का वर्णन नायाधम्मकहा नामक ग्रन्थ में मिलता है .
  • महावीर स्वामी और जामाली के मध्य विवाद का कारण क्रियामान सिद्धांत था .
  • कर्नाटक में जैन मठों को बसादी के नाम से जाना जाता है 
  • महावीर की मृत्यु के बाद जैन संघ का प्रथम थेरा ( मुख्य उपदेशक ) आचार्य सुधर्मन बने थे. ये महावीर के 11 गणधरों में से एक थे. शेष 10 गणधरों की मृत्यु महावीर के जीवन काल में ही हो गई थी 
  • आचार्य सुधर्मन के पश्चात जम्भू स्वामी थेरा ( मुख्य उपदेशक ) बने . ये ऐसे अंतिम थेरा थे जिन्होंने कैवल्य प्राप्त किया 
  • अंतिम नन्द शासक के समय सम्भूति विजय एवं भद्रबाहु के द्वारा जैन संघ की अध्यक्षता की गई थी. 
  • जैन संघ में प्रथम विभाजन महावीर स्वामी के दामाद जामाली के द्वारा किया गया तथा दूसरा विभाजन तिष्य गुप्त के समय हुआ.
  • जैन संघ के श्वेताम्बर तथा दिगंबर में विभाजन के समय जैन संघ के अध्यक्ष वज्रसेन थे 
  • जैन मुनि हरिविजय सूरी ने अनेकांत विजय नमक पुस्तक लिखी थी. 
  • अंतिम जैन आचार्य हेमचन्द्र सूरी ( श्वेताम्बर संप्रदाय ) हुए 

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आपका अपना 
देवकरण गंडास 
व्याख्याता इतिहास 
राजस्थान शिक्षा विभाग 

IndianHistory : जैन दर्शन

 नमस्कार दोस्तों ,

आज के इस ब्लॉग में हम चर्चा करेंगे जैन दर्शन के बारे में . 

इस ब्लॉग में हम महावीर स्वामी की प्रमुख शिक्षाओं तथा उनके सिद्धांतों के बारे में बात करेंगे .

तो आइये जानते हैं जैन दर्शन के बारे में ..........



जैन दर्शन : शिक्षाएं और सिद्धांत 

महावीर स्वामी का अपने पूर्वगामी तीर्थंकर पार्श्वनाथ से दो बातों में मतभेद था :

  1. पार्श्वनाथ ने भिक्षुओं के लिए केवल चार व्रतों का विधान किया था - सत्य , अहिंसा , अस्तेय तथा अपरिग्रह . परन्तु महावीर ने इसमें एक पांचवां व्रत : ब्रह्मचर्य भी जोड़ दिया और उसका पालन करना अनिवार्य बताया .
  2. दूसरा मतभेद यह था कि पार्श्वनाथ ने भिक्षुओं को वस्त्र धारण करने की अनुमति प्रदान की थी परन्तु महावीर ने उन्हें नग्न रहने का उपदेश दिया .

💠 जैन धर्म के पंच महाव्रत :

महावीर स्वामी ने इनका विधान भिक्षुओं के पालनार्थ किया था . पंच महाव्रत इस प्रकार से हैं :

👉 सत्य :-  इसमें सदैव सत्य बोलने पर जोर दिया गया है . इसका आचरण निम्नवत है 
  • सोच विचार कर बोलना चाहिए 
  • क्रोध आने अपर शांत रहना चाहिए 
  • लोभ होने पर मौन रहना चाहिए 
  • हंसी मे भी झूठ नहीं बोलना चाहिए 
  • भय होने पर भी झूठ नहीं बोलना चाहिए 
👉 अहिंसा :- यह जैन धर्म का प्रमुख सिद्धांत है . इसमें सभी प्रकार की अहिंसा पर बल दिया गया है . इसके पालन के लिए निम्न आचारों का निर्देश दिया गया है :

  • इर्या समिति  - संयम से चलना ताकि मार्ग में पदाघात से कोई हिंसा न हो 
  • भाषा समिति - संयम से बोलना ताकि कटु वचन से किसी को कष्ट न हो 
  • एषणा समिति - संयम से भोजन ग्रहण करना ताकि जीव हत्या न हो 
  • आदान निक्षेप समिति - किसी वस्तु को उठाने और रखने में विशेष सावधानी बरतना 
  • व्युत्सर्ग समिति - मल मूत्र का त्याग ऐसे स्थान पर करना जहाँ जीव हिंसा की आशंका न हो .
👉 अस्तेय :- इसमें निम्न बातें शामिल हैं :
  • बिना किसी की अनुमति के उसकी कोई वस्तु न लेना 
  • बिना आज्ञा किसी के घर में प्रवेश न करना 
  • गुरु की आज्ञा के बिना भिक्षा में प्राप्त अन्न ग्रहण न करना 
  • बिना अनुमति किसी के घर में निवास न करना 
👉 अपरिग्रह :- इसमें किसी नही प्रकार की सम्पति एकत्रित न करने पर जोर  गया है क्योकि सम्पति से मोह और आसक्ति का उदय होता है .

👉 ब्रह्मचर्य :- इसके अंतर्गत भिक्षु को निम्न निर्देश दिए गये हैं :
  • किसी स्त्री से बातें न करना 
  • किसी स्त्री को न देखना 
  • स्त्री संसर्ग की बात कभी न सोचना 
  • शुद्ध और अल्प भोजन ग्रहण करना 
  • ऐसे घर में न जाना जहाँ कोई स्त्री अकेले रहती हो 
महावीर ने गृहस्थों के लिए उपर्युक्त व्रतों को सरल ढंग से पालन करने का विधान प्रस्तुत किया . इसी कारण गृहस्थ जीवन के सम्बन्ध में इन्हें अणुव्रत कहा गया .


 

💠 जैन धर्म के त्रिरत्न : 

महावीर स्वामी ने मोक्ष या निर्वाण प्राप्ति के लिए अपने अनुयायियों के लिए त्रिरत्न प्रस्तुत किये . 

(1) सम्यक दर्शन : 

जैन तीर्थंकरों तथा उनके उपदेशों में दृढ़ विश्वास ही सम्यक दर्शन है . इसके बिना ज्ञान निरर्थक है . 

इसके आठ अंग बताये गये हैं : संदेह से दूर रहना, सांसारिक सुखों की इच्छा का त्याग करना, शरीर के मोहराग से दूर रहना, भ्रामक मार्ग पर न चलना, अधूरे विश्वासों से विचलित न होना, सही विश्वासों पर अटल रहना, सबके प्रति प्रेम भाव रखना तथा जैन सिद्धांतों को सर्वश्रेष्ठ समझना.

इसमें विश्वास करने वाला व्यक्ति तीन प्रकार की मुढताओं को छोड़ देता है :

1.लोक मूढ़ता  2. देव मूढ़ता 3. पाखंड मूढ़ता 

(2) सम्यक ज्ञान :

सम्यक ज्ञान से तात्पर्य किसी वस्तु के वास्तविक स्वरुप को जानने से है . 

सम्यक ज्ञान के पांच प्रकार बताये गये हैं :-

1. मति अर्थात इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान या बुद्धि जनित ज्ञान 

2. श्रुति अर्थात सुनकर प्राप्त किया गया ज्ञान 

3. अवधि अर्थात कही रखी हुई किसी वस्तु का दिव्य ज्ञान या अलौकिक ज्ञान 

4.मन: पर्याय अर्थात दूसरों के मन की बात को जान लेने का ज्ञान 

5. कैवल्य अर्थात पूर्ण या सर्वोच्च ज्ञान जो केवल तीर्थंकरों को प्राप्त है .

(3) सम्यक चरित्र :

इसके अंतर्गत व्यक्ति के आचरण पर बल दिया जाता है . इसके अंतर्गत भिक्षुओं के लिए पांच महाव्रत तथा गृहस्थों के लिए पांच अणुव्रत बताये गये हैं. 


⇒ त्रिरात्नों का अनुसरण करने से कर्मों का जीव की ओर बहाव रुक जाता है जिसे संवर कहते हैं .

⇒ संवर के बाद जीव में पहले से व्याप्त कर्म समाप्त होने लगते हैं . इस अवस्था को निर्जरा कहा गया है . 

⇒ जब जीव से कर्म का अवशेष बिलकुल समाप्त हो जाता है तब वह मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है.

⇒ मोक्ष के पश्चात् जीव आवागमन के चक्र से छुटकारा प् लेता है तथा अनंत चतुष्टय [ अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत वीर्य और अनंत सुख ] की प्राप्ति कर लेता है .


💠 स्यादवाद या अनेकान्तवाद 𑂽:

महावीर स्वामी ने आत्मवादियों तथा नास्तिकों के एकान्तिक मतों को छोड़कर बिच का मार्ग अपनाया जिसे स्यादवाद या अनेकांतवाद कहा गया . इसे सप्त्भंगीनय भी कहा जाता है . यह ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है. जैनियों के अनुसार सांसारिक वस्तुओं के विषय में समरे सभी निर्णय सापेक्ष्य एवं सिमित होते हैं. हम न तो किसी को पूर्णरूप से स्वीकार कर सकते हैं तथा न ही अस्वीकार . अतः हमें प्रत्येक निर्णय के पूर्व स्यात् लगाना चाहिए. इसके सात प्रकार बताये गये हैं :

  1. स्यात् अस्ति ( शायद यह वस्तु है )
  2. स्यात् नास्ति ( शायद यह नहीं है )
  3. स्यात् अस्ति च नास्ति ( शायद यह है भी और नहीं भी )
  4. स्यात् अव्यकतम ( शायद यह अव्यक्त है )
  5. स्यात् अस्ति अव्यकतम ( शायद यह है और अव्यक्त है )
  6. स्यात् नास्ति अव्यकतम ( शायद यह नहीं है और अव्यक्त है )
  7. स्यात् अस्ति च नास्ति च अव्यकतम  ( शायद यह है, नहीं है और अव्यक्त है )

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देवकरण गंडास 
व्याख्याता इतिहास 

IndianHistory : जैन धर्म तथा महावीर स्वामी

नमस्कार दोस्तों ,

आज के इस ब्लॉग में हम जैन धर्म तथा महावीर स्वामी के बारे में चर्चा करेंगे . 



 जैन धर्म :-

जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं l


प्रथम तीर्थंकर :- ऋषभदेव 

  • ये अयोध्या के राजा थे.
  • इनका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है . 
  • ये जैन धर्म के संस्थापक थे 
23 वें  तीर्थंकर :- पार्श्वनाथ 
  • ये काशी के राजा अश्वसेन और वामा के पुत्र थे 
  • इनके अनुयायी "निर्ग्रन्थ" कहलाते हैं 
  • इन्होंने अपने अनुयायियों को चार आयाम दिए , जिन्हें "चतुर्याम" कहा जाता है 
  1. सत्य 
  2. अहिंसा 
  3. अस्तेय 
  4. अपरिग्रह 
  • महावीर स्वामी के माता पिता इनके अनुयायी थे
  • पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी के मध्य 250 वर्ष का अंतराल है 

24 वें तीर्थंकर :- महावीर स्वामी 

  • इन्हें जैन धर्म का वास्तविक संथापक माना जाता है 
  • हमें इनके कई नाम मिलते है . जैसे :
  1. वर्धमान : - बचपन का नाम 
  2. जिन :- विजेता 
  3. महावीर :- अतुल पराक्रम करने वाला 
  4. निर्ग्रन्थ :- बंधन रहित 
  5. अर्हत :- योग्य 
  6. निगटठ नाथ पुत :- बौद्ध ग्रंथों में उल्लेखित नाम 
  7. केवलिन :- कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति के कारण   

महावीर स्वामी :

  • इनका जन्म 540 ईपू / 599 ईपू में वैशाली के निकट कुण्डग्राम में हुआ 
  • इनका जन्म ज्ञातृक क्षत्रिय कुल में हुआ था 
  • इनके पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक क्षत्रिय कुल के प्रधान थे तथा माता त्रिशला लिच्छवी नरेश चेटक की बहन थी 
  • मातृपक्ष से वो मगध के हर्यक वंश के राजाओं - बिम्बिसार तथा अजातशत्रु के निकट सम्बन्धी थे 
  • इनके बचपन का नाम वर्द्धमान था 
  • इनका विवाह कुन्दिन्य गोत्र की कन्या यशोदा के साथ हुआ था 
  • इनकी पुत्री का नाम अणोज्जा / प्रियदर्शना था , जिसका विवाह महावीर स्वामी ने अपनी बहन सुदर्शना के पुत्र जामाली के साथ किया था 
  • जामाली प्रारंभ में महावीर स्वामी का शिष्य बना परन्तु उसने ही जैन धर्म में प्रथम भेद किया था 
  • कल्पसूत्र से पता चलता है कि बुद्ध के समान वर्द्धमान के विषय में भी ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि वे या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेंगे या महान तपस्वी 
  •   महावीर स्वामी ने 30 वर्ष की आयु में बड़े भाई नन्दिवर्द्धन की आज्ञा से गृहत्याग किया 
  • 12 वर्ष की कठोर तपस्या के पश्चात ऋजुपालिका नदी के किनारे ऋज्जम्भिक ग्राम में महावीर स्वामी को साल वृक्ष के नीचे कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और वो केवलिन कहलाये  
  • महावीर स्वामी ने अपना पहला उपदेश  12 गणधरों को राजगृह के निकट विपुलाचल पहाड़ी पर दिया था 
  • इन 12 गणधरों में से मक्खिलपुत्र गोशाल ( आजीवक संप्रदाय के संस्थापक ) के अलग हो जाने के कारण महावीर स्वामी ने केवल 11 गणधरों के साथ जैन संघ की स्थापना की 
  • महावीर स्वामी ने अपना अंतिम उपदेश मल्ल गणराज्य की राजधानी पावापुरी में राजा सस्तीपाल के महल में दिया था 
  • 72 वर्ष की आयु में पावापुरी में 468 ईपू / 527 ईपू में उन्होंने शरीर त्याग दिया 

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बहुत बहुत धन्यवाद 

आपका अपना 
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