नमस्कार दोस्तों ,
आज के इस ब्लॉग में हम चर्चा करेंगे जैन दर्शन के बारे में .
इस ब्लॉग में हम महावीर स्वामी की प्रमुख शिक्षाओं तथा उनके सिद्धांतों के बारे में बात करेंगे .
तो आइये जानते हैं जैन दर्शन के बारे में ..........
जैन दर्शन : शिक्षाएं और सिद्धांत
महावीर स्वामी का अपने पूर्वगामी तीर्थंकर पार्श्वनाथ से दो बातों में मतभेद था :
- पार्श्वनाथ ने भिक्षुओं के लिए केवल चार व्रतों का विधान किया था - सत्य , अहिंसा , अस्तेय तथा अपरिग्रह . परन्तु महावीर ने इसमें एक पांचवां व्रत : ब्रह्मचर्य भी जोड़ दिया और उसका पालन करना अनिवार्य बताया .
- दूसरा मतभेद यह था कि पार्श्वनाथ ने भिक्षुओं को वस्त्र धारण करने की अनुमति प्रदान की थी परन्तु महावीर ने उन्हें नग्न रहने का उपदेश दिया .
💠 जैन धर्म के पंच महाव्रत :
महावीर स्वामी ने इनका विधान भिक्षुओं के पालनार्थ किया था . पंच महाव्रत इस प्रकार से हैं :
👉 सत्य :- इसमें सदैव सत्य बोलने पर जोर दिया गया है . इसका आचरण निम्नवत है- सोच विचार कर बोलना चाहिए
- क्रोध आने अपर शांत रहना चाहिए
- लोभ होने पर मौन रहना चाहिए
- हंसी मे भी झूठ नहीं बोलना चाहिए
- भय होने पर भी झूठ नहीं बोलना चाहिए
- इर्या समिति - संयम से चलना ताकि मार्ग में पदाघात से कोई हिंसा न हो
- भाषा समिति - संयम से बोलना ताकि कटु वचन से किसी को कष्ट न हो
- एषणा समिति - संयम से भोजन ग्रहण करना ताकि जीव हत्या न हो
- आदान निक्षेप समिति - किसी वस्तु को उठाने और रखने में विशेष सावधानी बरतना
- व्युत्सर्ग समिति - मल मूत्र का त्याग ऐसे स्थान पर करना जहाँ जीव हिंसा की आशंका न हो .
- बिना किसी की अनुमति के उसकी कोई वस्तु न लेना
- बिना आज्ञा किसी के घर में प्रवेश न करना
- गुरु की आज्ञा के बिना भिक्षा में प्राप्त अन्न ग्रहण न करना
- बिना अनुमति किसी के घर में निवास न करना
- किसी स्त्री से बातें न करना
- किसी स्त्री को न देखना
- स्त्री संसर्ग की बात कभी न सोचना
- शुद्ध और अल्प भोजन ग्रहण करना
- ऐसे घर में न जाना जहाँ कोई स्त्री अकेले रहती हो
महावीर ने गृहस्थों के लिए उपर्युक्त व्रतों को सरल ढंग से पालन करने का विधान प्रस्तुत किया . इसी कारण गृहस्थ जीवन के सम्बन्ध में इन्हें अणुव्रत कहा गया .
💠 जैन धर्म के त्रिरत्न :
महावीर स्वामी ने मोक्ष या निर्वाण प्राप्ति के लिए अपने अनुयायियों के लिए त्रिरत्न प्रस्तुत किये .
(1) सम्यक दर्शन :
जैन तीर्थंकरों तथा उनके उपदेशों में दृढ़ विश्वास ही सम्यक दर्शन है . इसके बिना ज्ञान निरर्थक है .
इसके आठ अंग बताये गये हैं : संदेह से दूर रहना, सांसारिक सुखों की इच्छा का त्याग करना, शरीर के मोहराग से दूर रहना, भ्रामक मार्ग पर न चलना, अधूरे विश्वासों से विचलित न होना, सही विश्वासों पर अटल रहना, सबके प्रति प्रेम भाव रखना तथा जैन सिद्धांतों को सर्वश्रेष्ठ समझना.
इसमें विश्वास करने वाला व्यक्ति तीन प्रकार की मुढताओं को छोड़ देता है :
1.लोक मूढ़ता 2. देव मूढ़ता 3. पाखंड मूढ़ता
(2) सम्यक ज्ञान :
सम्यक ज्ञान से तात्पर्य किसी वस्तु के वास्तविक स्वरुप को जानने से है .
सम्यक ज्ञान के पांच प्रकार बताये गये हैं :-
1. मति अर्थात इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान या बुद्धि जनित ज्ञान
2. श्रुति अर्थात सुनकर प्राप्त किया गया ज्ञान
3. अवधि अर्थात कही रखी हुई किसी वस्तु का दिव्य ज्ञान या अलौकिक ज्ञान
4.मन: पर्याय अर्थात दूसरों के मन की बात को जान लेने का ज्ञान
5. कैवल्य अर्थात पूर्ण या सर्वोच्च ज्ञान जो केवल तीर्थंकरों को प्राप्त है .
(3) सम्यक चरित्र :
इसके अंतर्गत व्यक्ति के आचरण पर बल दिया जाता है . इसके अंतर्गत भिक्षुओं के लिए पांच महाव्रत तथा गृहस्थों के लिए पांच अणुव्रत बताये गये हैं.
⇒ त्रिरात्नों का अनुसरण करने से कर्मों का जीव की ओर बहाव रुक जाता है जिसे संवर कहते हैं .
⇒ संवर के बाद जीव में पहले से व्याप्त कर्म समाप्त होने लगते हैं . इस अवस्था को निर्जरा कहा गया है .
⇒ जब जीव से कर्म का अवशेष बिलकुल समाप्त हो जाता है तब वह मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है.
⇒ मोक्ष के पश्चात् जीव आवागमन के चक्र से छुटकारा प् लेता है तथा अनंत चतुष्टय [ अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत वीर्य और अनंत सुख ] की प्राप्ति कर लेता है .
💠 स्यादवाद या अनेकान्तवाद :
महावीर स्वामी ने आत्मवादियों तथा नास्तिकों के एकान्तिक मतों को छोड़कर बिच का मार्ग अपनाया जिसे स्यादवाद या अनेकांतवाद कहा गया . इसे सप्त्भंगीनय भी कहा जाता है . यह ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है. जैनियों के अनुसार सांसारिक वस्तुओं के विषय में समरे सभी निर्णय सापेक्ष्य एवं सिमित होते हैं. हम न तो किसी को पूर्णरूप से स्वीकार कर सकते हैं तथा न ही अस्वीकार . अतः हमें प्रत्येक निर्णय के पूर्व स्यात् लगाना चाहिए. इसके सात प्रकार बताये गये हैं :
- स्यात् अस्ति ( शायद यह वस्तु है )
- स्यात् नास्ति ( शायद यह नहीं है )
- स्यात् अस्ति च नास्ति ( शायद यह है भी और नहीं भी )
- स्यात् अव्यकतम ( शायद यह अव्यक्त है )
- स्यात् अस्ति अव्यकतम ( शायद यह है और अव्यक्त है )
- स्यात् नास्ति अव्यकतम ( शायद यह नहीं है और अव्यक्त है )
- स्यात् अस्ति च नास्ति च अव्यकतम ( शायद यह है, नहीं है और अव्यक्त है )

Super गुरुदेव 👍🙏
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
हटाएंसाथ बने रहिए और निरंतर सीखते रहिए