शुक्रवार, 14 मई 2021

IndianHistory : जैन तीर्थंकर एवं जैन संगीतियाँ

नमस्कार दोस्तों ,

मैं देवकरण गंडास आप सभी का हार्दिक स्वागत करता हूँ इस ब्लॉग पर . दोस्तों आज की पोस्ट में हम जैन संप्रदाय के तीर्थंकरों एवं जैन धर्म की संगीतियों के बारे में बात करेंगे .





इससे पहले की पोस्ट में हमने जैन धर्म तथा जैन दर्शन पर व्यापक चर्चा की थी . इसके लिए आप निम्न लिंक पर जा सकते हैं 

जैन धर्म : https://devgandas.blogspot.com/2021/05/indianhistory01.html

जैन दर्शन : https://devgandas.blogspot.com/2021/05/indianhistory02.html 

तो इस पोस्ट में बात करते हैं जैन तीर्थंकर और जैन संगीतियों के बारे में 

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जैन तीर्थंकर : महत्वपूर्ण तथ्य 

जैन परंपरा के अनुसार जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं . हम परीक्षा की दृष्टी से उपयोगी कुछ महत्वपूर्ण तीर्थंकरों के बारे में यहाँ चर्चा करेंगे .

प्रथम तीर्थंकर : ऋषभ देव / आदिनाथ 

  • पिता : अयोध्या नरेश नाभि 
  • माता : मरू देवी 
  • पत्नी : सुनंदा 
  • ये अयोध्या के राजा थे 
  • इन्होंने कैलाश पर्वत पर निर्वाण प्राप्त किया था 
  • इनकी कुषाण कालीन मूर्तियाँ मथुरा से प्राप्त होती हैं 
  • इनका उल्लेख ऋग्वेद में शम्भू कश्यप के नाम से मिलता है 
  • इन्हें विष्णु पुराण तथा भागवत पुराण में विष्णु का अवतार माना गया है 
  • इनका शासन देवता चक्रेश्वरी को माना जाता है 
  • इनका प्रतीक चिन्ह वृषभ माना जाता है.

दुसरे तीर्थंकर : अजित नाथ 

  • पिता : जित शत्रु 
  • माता : विजया देवी 
  • 12 वर्ष की कठोर तपस्या के पश्चात अयोध्या में कैवल्य प्राप्त किया 
  • इनकी प्राचीनतम प्रतिमाएं वाराणसी से प्राप्त होती हैं .

तीसरे तीर्थंकर : संभव नाथ 

  • पिता : जितारी ( श्रावस्ती के राजा )
  • माता : सोना देवी 
  • इनको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति श्रावस्ती में हुई .

चौथे तीर्थंकर : अभिनन्दन 

  • पिता :संवर 
  • माता : सिद्धार्थी 
  • इनकी 10वीं सदी से पहले की कोई प्रतिमा विद्यमान नहीं है 
  • इनकी कुछ प्रतिमाएं खजुराहो से प्राप्त होती हैं .

पांचवें तीर्थंकर : सुमतिनाथ 

  • पिता : मेघ ( अयोध्या के राजा )
  • माता : मंगला 
  • इनको 20 वर्ष की कठोर तपश्चर्या के पश्चात कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई 
  • इनकी भी 10वीं सदी से पहले की कोई प्रतिमा विद्यमान नहीं है .

6. पदमप्रभ  
7. सुपार्श्व 
8.चन्द्र प्रभ 
9. पुष्पदन्त 
10. शीतल 
11. श्रेयांश 
12. वासु पूज्य 
13. विमल 
14. अनन्त 
15. धर्म 
16. शांति 
17. कुन्थु 
18.अरह 

19 वें तीर्थंकर : मल्ली नाथ 

  • पिता : कुम्भ ( मिथिला के शासक )
  • माता : प्रभावती 
  • श्वेताम्बर संप्रदाय के अनुयायी मल्ली को एक स्त्री तीर्थंकर मानते हैं 
  • दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी मल्लीनाथ को पुरुष तीर्थंकर मानते हैं .

20. मुनि सुब्रत 
21. नमि

22 वें तीर्थंकर : नेमिनाथ / अरिष्टनेमि 

  • इनका उल्लेख भी ऋग्वेद में मिलता है 
  • इनके शासन देवता के रूप में अम्बिका का नाम मिलता है 
  • इनका प्रतीक चिन्ह शंख है .

23 वें तीर्थंकर : पार्श्वनाथ

  • पिता : अश्वसेन ( काशी के राजा )
  • माता : वामा 
  • इनको ज्ञान की प्राप्ति धातकी वृक्ष के नीचे हुई 
  • इनको निर्वाण प्राप्ति पार्श्वनाथ पहाड़ी ( हजारीबाग , झारखण्ड ) में हुई 
  • ऐसा माना जाता है कि इनसे पहले के 19 तीर्थंकरों को भी निर्वाण प्राप्ति इसी पहाड़ी पर हुई थी 
  • इन्होंने महिलाओं को संघ में प्रवेश की अनुमती प्रदान की 
  • इनसे सम्बंधित यक्ष का नाम पद्मावती है 
  • इनका प्रतिक चिन्ह सांप माना जाता है .

24 वें तीर्थंकर : महावीर स्वामी 

  • पिता : सिद्धार्थ 
  • माता : त्रिशला 
  • पत्नी : यशोदा 
  • पुत्री : अणोज्जा / प्रियदर्शना 
  • दामाद : जामाली 
  • निर्वाण : पावापूरी 
  • इनकी शासन देवी सिद्धायिका मानी जाती है 
  • इनका प्रतीक चिन्ह सिंह है .

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जैन संगीतियाँ : महत्वपूर्ण तथ्य 


जैन धर्माचार्यों की कुल चार संगीतियाँ आयोजित की गई थी , जो इस प्रकार हैं 

प्रथम जैन संगीति :

  • आयोजन महावीर स्वामी की मृत्यु के २०० वर्ष पश्चात 
  • आयोजन स्थल : पाटलिपुत्र 
  • अध्यक्ष : स्थुलभद्र 
  • इस संगीति में जैन धर्म श्वेताम्बर तथा दिगंबर संप्रदाय में विभाजित हो गया था 
  • इसी समय जैन धर्म के 12 अंगों का भी संकलन किया गया था 
  • नोट :- इस समय मगध में 12 वर्षों का भयंकर अकाल पड़ा था . फलत: भद्रबाहु अपने शिष्यों के साथ कर्नाटक चले गये किन्तु कुछ अनुयायी स्थूलभद्र के साथ मगध में ही रुक गये . भद्रबाहु के वापिस लौटने पर मगध के साधुओं से उनका गहरा मतभेद हो गया तथा जैन धर्म दो भागों में बंट गया . स्थुलभद्र के अनुयायी श्वेताम्बर कहलाये तथा भद्रबाहु के दिगंबर 
  • प्रथम जैन संगीति में जो सिद्धांत निर्धारित किये गये थे , वे श्वेताम्बर संप्रदाय के मूल सिद्धांत बन गये .
  • दिगम्बरों ने प्रथम जैन संगीति में भाग नहीं लिया था 
  • नोट : छठी शताब्दी में श्वेताम्बरों में तेरापंथी तथा दिगम्बरों में समैया नामक उपसंप्रदाय का उदय हुआ .  समैया संप्रदाय वाले मूर्ति पूजा के स्थान पर पुस्तकों की पूजा पर बल देते हैं .

दूसरी जैन संगीति :

  • आयोजन : कलिंग नरेश खारवेल के शासन काल में 
  • सुपर्वत पर बनाये गये विजय चक्र नामक विशाल सभागार में 
  • इसमें 12 अंगों का पुन: संकलन किया गया 

तीसरी जैन संगीति : 

  • प्रथम सदी ईस्वी में 
  • आन्ध्र प्रदेश में वेणव नदी के किनारे 
  • अध्यक्ष : जैन आचार्य आर्हदली
  • इसमें 12 अंगों का विवेचन किया गया 

चतुर्थ जैन संगीति : 

  • 512 ईस्वी में 
  • गुजरात के वल्लभी में 
  • अध्यक्ष : देवर्धि क्षमाश्रमण 
  • इसमें जैन आगम साहित्य का संकलन किया गया 
  • इस सभा द्वारा निर्धारित किया गया जैन धर्म का स्वरुप आज तक विद्यमान है.

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जैन धर्म के संरक्षक शासक एवं राजवंश :

  1. मौर्य शासक चन्द्रगुप्त 
  2. मौर्य शासक सम्प्रति 
  3. कलिंग नरेश खारवेल 
  4. गंग वंश के शासक 
  5. कदम्ब वंश 
  6. गुजरात के चालुक्य 
  7. राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष 

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अन्य महत्वपूर्ण तथ्य :

  • लिच्छवी नरेश चेटक महावीर स्वामी का अनुयायी था . आवश्यक चूर्णी नामक ग्रन्थ से चेटक विषयक जानकारी मिलती है .
  • महावीर स्वामी के तप का वर्णन आचरांग सूत्र में मिलता है .
  • मक्खलीपुत्त गोशाल महावीर स्वामी का शिष्य नालंदा में बना था .
  • महावीर स्वामी की प्रथम भिक्षुणी तथा भिक्षुणी संघ की प्रथम अध्यक्ष चंपा की राजकुमारी चंदना थी , जो चंपा नरेश दधिवाहन की पुत्री थी. 
  • महावीर स्वामी के जीवन चरित्र का वर्णन भगवती सुत्त में मिलता है. 
  • महावीर स्वामी की शिक्षाओं का वर्णन नायाधम्मकहा नामक ग्रन्थ में मिलता है .
  • महावीर स्वामी और जामाली के मध्य विवाद का कारण क्रियामान सिद्धांत था .
  • कर्नाटक में जैन मठों को बसादी के नाम से जाना जाता है 
  • महावीर की मृत्यु के बाद जैन संघ का प्रथम थेरा ( मुख्य उपदेशक ) आचार्य सुधर्मन बने थे. ये महावीर के 11 गणधरों में से एक थे. शेष 10 गणधरों की मृत्यु महावीर के जीवन काल में ही हो गई थी 
  • आचार्य सुधर्मन के पश्चात जम्भू स्वामी थेरा ( मुख्य उपदेशक ) बने . ये ऐसे अंतिम थेरा थे जिन्होंने कैवल्य प्राप्त किया 
  • अंतिम नन्द शासक के समय सम्भूति विजय एवं भद्रबाहु के द्वारा जैन संघ की अध्यक्षता की गई थी. 
  • जैन संघ में प्रथम विभाजन महावीर स्वामी के दामाद जामाली के द्वारा किया गया तथा दूसरा विभाजन तिष्य गुप्त के समय हुआ.
  • जैन संघ के श्वेताम्बर तथा दिगंबर में विभाजन के समय जैन संघ के अध्यक्ष वज्रसेन थे 
  • जैन मुनि हरिविजय सूरी ने अनेकांत विजय नमक पुस्तक लिखी थी. 
  • अंतिम जैन आचार्य हेमचन्द्र सूरी ( श्वेताम्बर संप्रदाय ) हुए 

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देवकरण गंडास 
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राजस्थान शिक्षा विभाग 

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