नमस्कार दोस्तों ,
आज के इस ब्लॉग में हम जैन धर्म तथा महावीर स्वामी के बारे में चर्चा करेंगे .
जैन धर्म :-
जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं lप्रथम तीर्थंकर :- ऋषभदेव
- ये अयोध्या के राजा थे.
- इनका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है .
- ये जैन धर्म के संस्थापक थे
- ये काशी के राजा अश्वसेन और वामा के पुत्र थे
- इनके अनुयायी "निर्ग्रन्थ" कहलाते हैं
- इन्होंने अपने अनुयायियों को चार आयाम दिए , जिन्हें "चतुर्याम" कहा जाता है
- सत्य
- अहिंसा
- अस्तेय
- अपरिग्रह
- महावीर स्वामी के माता पिता इनके अनुयायी थे
- पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी के मध्य 250 वर्ष का अंतराल है
24 वें तीर्थंकर :- महावीर स्वामी
- इन्हें जैन धर्म का वास्तविक संथापक माना जाता है
- हमें इनके कई नाम मिलते है . जैसे :
- वर्धमान : - बचपन का नाम
- जिन :- विजेता
- महावीर :- अतुल पराक्रम करने वाला
- निर्ग्रन्थ :- बंधन रहित
- अर्हत :- योग्य
- निगटठ नाथ पुत :- बौद्ध ग्रंथों में उल्लेखित नाम
- केवलिन :- कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति के कारण
महावीर स्वामी :
- इनका जन्म 540 ईपू / 599 ईपू में वैशाली के निकट कुण्डग्राम में हुआ
- इनका जन्म ज्ञातृक क्षत्रिय कुल में हुआ था
- इनके पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक क्षत्रिय कुल के प्रधान थे तथा माता त्रिशला लिच्छवी नरेश चेटक की बहन थी
- मातृपक्ष से वो मगध के हर्यक वंश के राजाओं - बिम्बिसार तथा अजातशत्रु के निकट सम्बन्धी थे
- इनके बचपन का नाम वर्द्धमान था
- इनका विवाह कुन्दिन्य गोत्र की कन्या यशोदा के साथ हुआ था
- इनकी पुत्री का नाम अणोज्जा / प्रियदर्शना था , जिसका विवाह महावीर स्वामी ने अपनी बहन सुदर्शना के पुत्र जामाली के साथ किया था
- जामाली प्रारंभ में महावीर स्वामी का शिष्य बना परन्तु उसने ही जैन धर्म में प्रथम भेद किया था
- कल्पसूत्र से पता चलता है कि बुद्ध के समान वर्द्धमान के विषय में भी ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि वे या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेंगे या महान तपस्वी
- महावीर स्वामी ने 30 वर्ष की आयु में बड़े भाई नन्दिवर्द्धन की आज्ञा से गृहत्याग किया
- 12 वर्ष की कठोर तपस्या के पश्चात ऋजुपालिका नदी के किनारे ऋज्जम्भिक ग्राम में महावीर स्वामी को साल वृक्ष के नीचे कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और वो केवलिन कहलाये
- महावीर स्वामी ने अपना पहला उपदेश 12 गणधरों को राजगृह के निकट विपुलाचल पहाड़ी पर दिया था
- इन 12 गणधरों में से मक्खिलपुत्र गोशाल ( आजीवक संप्रदाय के संस्थापक ) के अलग हो जाने के कारण महावीर स्वामी ने केवल 11 गणधरों के साथ जैन संघ की स्थापना की
- महावीर स्वामी ने अपना अंतिम उपदेश मल्ल गणराज्य की राजधानी पावापुरी में राजा सस्तीपाल के महल में दिया था
- 72 वर्ष की आयु में पावापुरी में 468 ईपू / 527 ईपू में उन्होंने शरीर त्याग दिया
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बहुत बहुत धन्यवाद
आपका अपना
देवकरण गंडास
व्याख्याता इतिहास

अपना ज्ञान हमारे साथ साझा करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार
हटाएंयह तो सम्पूर्ण वीडियो का सारांश बता दिया आपने बहुत बहुत धन्यवाद सर जी
जवाब देंहटाएंस्वागत है आपका
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