नमस्कार दोस्तों ,
मैं देवकरण गंडास आप सभी का हार्दिक स्वागत करता हूँ इस ब्लॉग पर . दोस्तों आज की पोस्ट में हम जैन संप्रदाय के तीर्थंकरों एवं जैन धर्म की संगीतियों के बारे में बात करेंगे .
इससे पहले की पोस्ट में हमने जैन धर्म तथा जैन दर्शन पर व्यापक चर्चा की थी . इसके लिए आप निम्न लिंक पर जा सकते हैं
जैन धर्म : https://devgandas.blogspot.com/2021/05/indianhistory01.html
जैन दर्शन : https://devgandas.blogspot.com/2021/05/indianhistory02.html
तो इस पोस्ट में बात करते हैं जैन तीर्थंकर और जैन संगीतियों के बारे में
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जैन तीर्थंकर : महत्वपूर्ण तथ्य
जैन परंपरा के अनुसार जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं . हम परीक्षा की दृष्टी से उपयोगी कुछ महत्वपूर्ण तीर्थंकरों के बारे में यहाँ चर्चा करेंगे .
प्रथम तीर्थंकर : ऋषभ देव / आदिनाथ
- पिता : अयोध्या नरेश नाभि
- माता : मरू देवी
- पत्नी : सुनंदा
- ये अयोध्या के राजा थे
- इन्होंने कैलाश पर्वत पर निर्वाण प्राप्त किया था
- इनकी कुषाण कालीन मूर्तियाँ मथुरा से प्राप्त होती हैं
- इनका उल्लेख ऋग्वेद में शम्भू कश्यप के नाम से मिलता है
- इन्हें विष्णु पुराण तथा भागवत पुराण में विष्णु का अवतार माना गया है
- इनका शासन देवता चक्रेश्वरी को माना जाता है
- इनका प्रतीक चिन्ह वृषभ माना जाता है.
दुसरे तीर्थंकर : अजित नाथ
- पिता : जित शत्रु
- माता : विजया देवी
- 12 वर्ष की कठोर तपस्या के पश्चात अयोध्या में कैवल्य प्राप्त किया
- इनकी प्राचीनतम प्रतिमाएं वाराणसी से प्राप्त होती हैं .
तीसरे तीर्थंकर : संभव नाथ
- पिता : जितारी ( श्रावस्ती के राजा )
- माता : सोना देवी
- इनको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति श्रावस्ती में हुई .
चौथे तीर्थंकर : अभिनन्दन
- पिता :संवर
- माता : सिद्धार्थी
- इनकी 10वीं सदी से पहले की कोई प्रतिमा विद्यमान नहीं है
- इनकी कुछ प्रतिमाएं खजुराहो से प्राप्त होती हैं .
पांचवें तीर्थंकर : सुमतिनाथ
- पिता : मेघ ( अयोध्या के राजा )
- माता : मंगला
- इनको 20 वर्ष की कठोर तपश्चर्या के पश्चात कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई
- इनकी भी 10वीं सदी से पहले की कोई प्रतिमा विद्यमान नहीं है .
19 वें तीर्थंकर : मल्ली नाथ
- पिता : कुम्भ ( मिथिला के शासक )
- माता : प्रभावती
- श्वेताम्बर संप्रदाय के अनुयायी मल्ली को एक स्त्री तीर्थंकर मानते हैं
- दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी मल्लीनाथ को पुरुष तीर्थंकर मानते हैं .
22 वें तीर्थंकर : नेमिनाथ / अरिष्टनेमि
- इनका उल्लेख भी ऋग्वेद में मिलता है
- इनके शासन देवता के रूप में अम्बिका का नाम मिलता है
- इनका प्रतीक चिन्ह शंख है .
23 वें तीर्थंकर : पार्श्वनाथ
- पिता : अश्वसेन ( काशी के राजा )
- माता : वामा
- इनको ज्ञान की प्राप्ति धातकी वृक्ष के नीचे हुई
- इनको निर्वाण प्राप्ति पार्श्वनाथ पहाड़ी ( हजारीबाग , झारखण्ड ) में हुई
- ऐसा माना जाता है कि इनसे पहले के 19 तीर्थंकरों को भी निर्वाण प्राप्ति इसी पहाड़ी पर हुई थी
- इन्होंने महिलाओं को संघ में प्रवेश की अनुमती प्रदान की
- इनसे सम्बंधित यक्ष का नाम पद्मावती है
- इनका प्रतिक चिन्ह सांप माना जाता है .
24 वें तीर्थंकर : महावीर स्वामी
- पिता : सिद्धार्थ
- माता : त्रिशला
- पत्नी : यशोदा
- पुत्री : अणोज्जा / प्रियदर्शना
- दामाद : जामाली
- निर्वाण : पावापूरी
- इनकी शासन देवी सिद्धायिका मानी जाती है
- इनका प्रतीक चिन्ह सिंह है .
जैन संगीतियाँ : महत्वपूर्ण तथ्य
प्रथम जैन संगीति :
- आयोजन महावीर स्वामी की मृत्यु के २०० वर्ष पश्चात
- आयोजन स्थल : पाटलिपुत्र
- अध्यक्ष : स्थुलभद्र
- इस संगीति में जैन धर्म श्वेताम्बर तथा दिगंबर संप्रदाय में विभाजित हो गया था
- इसी समय जैन धर्म के 12 अंगों का भी संकलन किया गया था
- नोट :- इस समय मगध में 12 वर्षों का भयंकर अकाल पड़ा था . फलत: भद्रबाहु अपने शिष्यों के साथ कर्नाटक चले गये किन्तु कुछ अनुयायी स्थूलभद्र के साथ मगध में ही रुक गये . भद्रबाहु के वापिस लौटने पर मगध के साधुओं से उनका गहरा मतभेद हो गया तथा जैन धर्म दो भागों में बंट गया . स्थुलभद्र के अनुयायी श्वेताम्बर कहलाये तथा भद्रबाहु के दिगंबर
- प्रथम जैन संगीति में जो सिद्धांत निर्धारित किये गये थे , वे श्वेताम्बर संप्रदाय के मूल सिद्धांत बन गये .
- दिगम्बरों ने प्रथम जैन संगीति में भाग नहीं लिया था
- नोट : छठी शताब्दी में श्वेताम्बरों में तेरापंथी तथा दिगम्बरों में समैया नामक उपसंप्रदाय का उदय हुआ . समैया संप्रदाय वाले मूर्ति पूजा के स्थान पर पुस्तकों की पूजा पर बल देते हैं .
दूसरी जैन संगीति :
- आयोजन : कलिंग नरेश खारवेल के शासन काल में
- सुपर्वत पर बनाये गये विजय चक्र नामक विशाल सभागार में
- इसमें 12 अंगों का पुन: संकलन किया गया
तीसरी जैन संगीति :
- प्रथम सदी ईस्वी में
- आन्ध्र प्रदेश में वेणव नदी के किनारे
- अध्यक्ष : जैन आचार्य आर्हदली
- इसमें 12 अंगों का विवेचन किया गया
चतुर्थ जैन संगीति :
- 512 ईस्वी में
- गुजरात के वल्लभी में
- अध्यक्ष : देवर्धि क्षमाश्रमण
- इसमें जैन आगम साहित्य का संकलन किया गया
- इस सभा द्वारा निर्धारित किया गया जैन धर्म का स्वरुप आज तक विद्यमान है.
जैन धर्म के संरक्षक शासक एवं राजवंश :
- मौर्य शासक चन्द्रगुप्त
- मौर्य शासक सम्प्रति
- कलिंग नरेश खारवेल
- गंग वंश के शासक
- कदम्ब वंश
- गुजरात के चालुक्य
- राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य :
- लिच्छवी नरेश चेटक महावीर स्वामी का अनुयायी था . आवश्यक चूर्णी नामक ग्रन्थ से चेटक विषयक जानकारी मिलती है .
- महावीर स्वामी के तप का वर्णन आचरांग सूत्र में मिलता है .
- मक्खलीपुत्त गोशाल महावीर स्वामी का शिष्य नालंदा में बना था .
- महावीर स्वामी की प्रथम भिक्षुणी तथा भिक्षुणी संघ की प्रथम अध्यक्ष चंपा की राजकुमारी चंदना थी , जो चंपा नरेश दधिवाहन की पुत्री थी.
- महावीर स्वामी के जीवन चरित्र का वर्णन भगवती सुत्त में मिलता है.
- महावीर स्वामी की शिक्षाओं का वर्णन नायाधम्मकहा नामक ग्रन्थ में मिलता है .
- महावीर स्वामी और जामाली के मध्य विवाद का कारण क्रियामान सिद्धांत था .
- कर्नाटक में जैन मठों को बसादी के नाम से जाना जाता है
- महावीर की मृत्यु के बाद जैन संघ का प्रथम थेरा ( मुख्य उपदेशक ) आचार्य सुधर्मन बने थे. ये महावीर के 11 गणधरों में से एक थे. शेष 10 गणधरों की मृत्यु महावीर के जीवन काल में ही हो गई थी
- आचार्य सुधर्मन के पश्चात जम्भू स्वामी थेरा ( मुख्य उपदेशक ) बने . ये ऐसे अंतिम थेरा थे जिन्होंने कैवल्य प्राप्त किया
- अंतिम नन्द शासक के समय सम्भूति विजय एवं भद्रबाहु के द्वारा जैन संघ की अध्यक्षता की गई थी.
- जैन संघ में प्रथम विभाजन महावीर स्वामी के दामाद जामाली के द्वारा किया गया तथा दूसरा विभाजन तिष्य गुप्त के समय हुआ.
- जैन संघ के श्वेताम्बर तथा दिगंबर में विभाजन के समय जैन संघ के अध्यक्ष वज्रसेन थे
- जैन मुनि हरिविजय सूरी ने अनेकांत विजय नमक पुस्तक लिखी थी.
- अंतिम जैन आचार्य हेमचन्द्र सूरी ( श्वेताम्बर संप्रदाय ) हुए

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